कवित्री का स्वयंवर – Poem By Prakam Singh Rajpoot

कवित्री का स्वयंवर – Poem By Prakam Singh Rajpoot

*कवित्री का स्वयंवर*
था एक कवित्री का स्वयंवरआये थे उसमें एक से बढ़कर एक धुरंधरनहीं थी कोई बंदिशें क्योंकि ये था कवित्री का स्वयंवरआप तो जानते ही हैं रचनाकारों की नहीं होती कोई सीमायें।उनके लिए तो सब कुछ होती है उनकी रचनाएँ।उस स्वयंवर में आये थे वेदों के विद्वान और आये थे कुछ वीर महान।फिर कया सब करने लगे अपना ज्ञान बखान।आया था उसमें एक सामान्य सा दिखने वाला इंसान,पर वो भी था एक अच्छा श्रोता इसलिए वो भी नहीं था किसी से कम महानकवित्री ने कहा, आप क्यों बैठे हैं इतना चुप, सुनायेंगें नहीं अपना कुछ?तब वह श्रोता बोला, मैं हूँ एक अच्छा श्रोतासुन रहा था ध्यान से सब, बोलने के लिए नहीं ज्यादा कुछ। पहले प्रेमी हूँ आपकी रचनाओं का, आपकी कविताओं का, उसके बाद इन रचनाओं की बिन ब्याही माँ का।अब थी तो वह भी एक स्त्री ऊपर से एक कवित्री।फिर क्या उठायी उसने माला, बना लिया उसे वर और  डाल दी वरमाला।कहा यूँ तो मिल जाते है, एक से बढ़कर एक सुनाने वाले, बहुत ही कम मिलते हैं ध्यान से सुनने वाले।